Ghamasaana / नई दिल्ली : ग्लूकोमा जागरूकता वर्कशॉप में आनुवंशिक जांच पर जोर

नई दिल्ली। सैलफोर्ड यूनिवर्सिटी (यूके), सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ़ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (सीएसआईआर-आईजीआईबी) और भारतीय दुर्लभ रोग संगठन (ओआरडीआई) ने मिलकर “ग्लूकोमा के लिए उचित और प्रारंभिक आनुवंशिक देखभाल की ओर” विषय पर राष्ट्रीय वर्कशॉप का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में प्रेमास लाइफ साइंसेज और श्रॉफ आई हॉस्पिटल भी सहभागी रहे। वर्कशॉप का उद्देश्य ग्लूकोमा (काला मोतिया) के कारण बचपन में होने वाले अंधेपन की रोकथाम के लिए प्रारंभिक आनुवंशिक जांच की आवश्यकता को रेखांकित करना था।

इस अवसर पर रिपल्स ऑफ़ लाइट नामक शॉर्ट फिल्म का प्रीमियर भी किया गया, जो 2023 की चर्चित डॉक्यूमेंट्री विजन ऑफ़ द ब्लाइंड लेडी का 12 मिनट का सीक्वल है। यह फिल्म दिखाती है कि किस तरह आनुवंशिक जांच और शुरुआती पहचान से कई बच्चों की दृष्टि बचाई जा सकती है।

कार्यक्रम की शुरुआत सीएसआईआर-आईजीआईबी के निदेशक डॉ. सौविक मैती के स्वागत भाषण से हुई। इस दौरान प्रो. अरिजीत मुखोपाध्याय (सैलफोर्ड यूनिवर्सिटी), प्रो. बी.के. थेल्मा (दिल्ली विश्वविद्यालय), डॉ. असीम सिल (विवेकानंद मिशन आश्रम नेत्र निर्मया निकेतन, पश्चिम बंगाल) समेत देशभर के विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।

डॉ. असीम सिल ने कहा, “डॉक्टर बीमारियों का इलाज करते हैं, मरीजों का नहीं। मरीजों की चिंता होती है कि वे अंधे होंगे या उनके बच्चे भी बीमारी का शिकार होंगे। हमें इसे समझने की जरूरत है।”

भारत में ग्लूकोमा के आनुवांशिक मामलों में बच्चे जन्म के शुरुआती सालों में ही बिना लक्षण दृष्टि खो देते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि आनुवांशिक जांच और परामर्श के जरिए इसे शुरुआती चरण में पकड़कर अंधापन रोका जा सकता है।

वर्कशॉप में इस बात पर चिंता जताई गई कि भारत में फिलहाल न तो आनुवंशिक जांच की नीति है और न ही बीमा मदद उपलब्ध है, जिससे जरूरतमंद मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा।

प्रो. बी.के. थेल्मा ने कहा, “चाहे बीमारी दुर्लभ हो या नहीं, हर बीमारी बोझ है। निवारक दवाओं और समय पर जांच से अनगिनत जीवन वर्ष बचाए जा सकते हैं।” वहीं, ओआरडीआई के प्रसन्ना शिरोल ने कहा, “दुर्लभ बीमारियों के मामले में हर परिवार गरीब है। इन्हें रोकने का एकमात्र उपाय जागरूकता, नीति और वकालत है।”

दिन के अंत में, प्रतिभागियों ने एक साझा अपील की कि आनुवंशिक जांच को भारत की नेत्र देखभाल प्रणाली में शामिल करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार की जाए और सरकारी, सामाजिक संगठनों व नागरिक समाज का सहयोग लिया जाए।

डॉ. सुनीता दुबे (ग्लूकोमा सेवाओं की प्रमुख, श्रॉफ आई हॉस्पिटल) ने कहा, “सिर्फ जागरूकता से ही मरीज आनुवंशिक जांच के लिए आगे आएंगे और इस बीमारी की रोकथाम संभव होगी।”

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